तुम आई थी?

 

अगध रात्रि सम नैनो में

श्याम लगाये सुरमाई थी,

मेरे नैनो में आई थी 

स्वपन में केवल तुम छाई थी,

तुम आई थी।


जीवन में प्रतिबिंब तुम्हारा

अधरों पे वो गीत समर्पित

और ठिठोली करती, मेरे

होठों पे जो हंसी छाई थी

तुम आई थी।


अमलतास के फूलों का 

आलिंगन करती

स्वपन में मेरे

हर्षित पलकों पर छाई थी,

तुम आई थी।


अधरों से मेरी पेशानी

पे जो खत लिखकर छोड़े थे

सावन की बूँदों ने फिर

सौगंध जो छूने की खाई थी

तुम आई थी?


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