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आत्म-प्रश्न

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अहो, उथल इस मनस में पुनः, कौन प्रश्न करता है? - यह स्व है, अंतस है, क्यों एकांत भंग करता है? यह स्व है? हे ईश मेरे मैं यह क्या सुनता हूँ, यह स्व है? फिर रोज छवि दर्शन किसका करता हूँ। - यह स्व है, तू रोज जिसे एकांत मिला करता है। यह स्व है, जो लौट स्रोत को जाने को लड़ता है। यह स्व है, इस स्व का अनुभव कैसे होगा तात? दर्शन दुर्लभ जिसके हो वो कैसे हो साक्षात। - गिरती है निस्पंद कमल से अमृत की एक धार, स्व के दर्शन, उस अमृत से स्व का साक्षात्कार। तात प्रश्न हैं कई अनुत्तर हल पाने को व्यग्र, जन्म मरण का बंधन क्यों है क्या जीवन के अग्र? - स्व में ही सब ज्ञान निहित है स्व से ही सब सृष्टि। स्व होता है प्राप्य उसी को जिसकी अंतर्दृष्टि। आश्चर्य यह मेरे प्रश्नों का उत्तर देता कौन? जिज्ञासा की क्षुधा बढ़ा ये क्यों बैठा मौन? - क्यूँ उद्विग्न होता है व्यर्थ यह तेरी ही वाणी । स्व कहते अंतस कहते भिन्न भिन्न सब ज्ञानी। हे स्व कह  इस दर्शन से फिर कैसा होगा लाभ, द्रष्टा दृश्य जब एक ही हो क्या आग में जलती आग? ठहर अभी मेरे प्रश्नों में बाकी है कुछ और, प्राप्त करूँ यदि अंतस को भी ईश्वर की क्या ठौर? देख जीव क...

पुनरावृत्ति

तिमिर से ढके विश्व में कोलाहल जब निद्रा के आलिंगनबद्ध हो चलता है, चांद आखिरी पहर चढ़ रहा होता है, अंधकार होता है चरम पर, वो साधक दूर धुंध उठती घाटियों में अपने अहम का होम करता है! जब घोर सन्नाटे में सब कलरव सो जाते हैं, जब सुदूर वनों में, दुर्बोध सहस्त्राब्दियों के साक्षी मन्दिर घंटियों से टकराती वायु को मौन इतिहास सुनाते हैं, उस त्रिकोण कुंड में भस्म होती है आहुति। कितने शरीरों में रह चुकी आत्मा अंतिम ऋण चुकाती है, कितने जीवनों की पुनरावृत्ति उभर आती है अधरों पर मंत्र बनकर! आत्मा करती है अंतिम हठ समिधा के साथ कर्म आहूत होते हैं, आत्मा वस्त्र त्यागती है, होती है  देवत्व की पुनरावृत्ति! 🍀

सोचो मुझपर क्या बीतेगी?

  जिन घाटों को छोड़ चली हो अविरल धारा तेरी गंगा, सोच की उन घाटों के उपर इस बिछड़न से  क्या बीतेगी. जिन नयनों ने अपलक ढोया था दुःखों का भार हमेशा, उन नयनों में अश्रु-धारा उन नयनों पर क्या बीतेगी. जिन हृदयों ने प्रेम ना देखा शुष्क रहे जो जीवन भर ही, प्रेम विह्वल हो विरह से सोचो उन हृदयों पर  क्या बीतेगी? आने वाली पूरनमासी नव जोड़े में कौमुदी सम तुम डोली पर बैठी वधु- बाला प्रियतम संग प्रयाण करोगी, कर जाओगी, सून ये गालियां इन गालियों पर क्या बीतेगी. सोचो मुझपर  क्या बीतेगी?

तुम आई थी?

  अगध रात्रि सम नैनो में श्याम लगाये सुरमाई थी, मेरे नैनो में आई थी  स्वपन में केवल तुम छाई थी, तुम आई थी। जीवन में प्रतिबिंब तुम्हारा अधरों पे वो गीत समर्पित और ठिठोली करती, मेरे होठों पे जो हंसी छाई थी तुम आई थी। अमलतास के फूलों का  आलिंगन करती स्वपन में मेरे हर्षित पलकों पर छाई थी, तुम आई थी। अधरों से मेरी पेशानी पे जो खत लिखकर छोड़े थे सावन की बूँदों ने फिर सौगंध जो छूने की खाई थी तुम आई थी?