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आत्म-प्रश्न

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अहो, उथल इस मनस में पुनः, कौन प्रश्न करता है? - यह स्व है, अंतस है, क्यों एकांत भंग करता है? यह स्व है? हे ईश मेरे मैं यह क्या सुनता हूँ, यह स्व है? फिर रोज छवि दर्शन किसका करता हूँ। - यह स्व है, तू रोज जिसे एकांत मिला करता है। यह स्व है, जो लौट स्रोत को जाने को लड़ता है। यह स्व है, इस स्व का अनुभव कैसे होगा तात? दर्शन दुर्लभ जिसके हो वो कैसे हो साक्षात। - गिरती है निस्पंद कमल से अमृत की एक धार, स्व के दर्शन, उस अमृत से स्व का साक्षात्कार। तात प्रश्न हैं कई अनुत्तर हल पाने को व्यग्र, जन्म मरण का बंधन क्यों है क्या जीवन के अग्र? - स्व में ही सब ज्ञान निहित है स्व से ही सब सृष्टि। स्व होता है प्राप्य उसी को जिसकी अंतर्दृष्टि। आश्चर्य यह मेरे प्रश्नों का उत्तर देता कौन? जिज्ञासा की क्षुधा बढ़ा ये क्यों बैठा मौन? - क्यूँ उद्विग्न होता है व्यर्थ यह तेरी ही वाणी । स्व कहते अंतस कहते भिन्न भिन्न सब ज्ञानी। हे स्व कह  इस दर्शन से फिर कैसा होगा लाभ, द्रष्टा दृश्य जब एक ही हो क्या आग में जलती आग? ठहर अभी मेरे प्रश्नों में बाकी है कुछ और, प्राप्त करूँ यदि अंतस को भी ईश्वर की क्या ठौर? देख जीव क...